देवनागरी लिपि के स्वर के उच्चारण साथ ध्यान किया है आपने कभी??
रोगों में निवारक देवनागरी लिपि के स्वर
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हिन्दी एवं अनेक अन्य भारतीय भाषाओं की लिपि को ” देवनागरी ” कहा जाता है। इस लिपि के उद्भव के विषय में कहा जाता है कि एक बार ” नटराज – महेश्वर ” ने नृत्य करते हुए डमरू बजाया , तो उससे 14 (चौदह) सूत्र प्रकट हुए जो ” महेश्वर सूत्र ” नाम से प्रसिद्ध हुए । इन्हीं सूत्रों से देवनागरी लिपि का उद्भव हुआ । इस लिपि के 12 स्वर अत्यन्त कल्याणकारी व मङ्गलमय माने जाते हैं । इनके समुचित प्रयोग से रोगों का उपचार व स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है ।
अ 👉 इस स्वर का उच्चारण कण्ठ से होता है । जितनी बार आप ” अ ” का उच्चारण करेंगे , उतनी बार हृदय की गति का संचालन तीव्रता से होगा , जिससे रक्त शुद्ध हो जाता है ।
आ 👉 इसके उच्चारण से दमा – खाँसी के रोग अच्छे होते हैं फेफड़े उत्तेजित होकर शुद्ध होते हैं । नियमित अभ्यास ऊपरी तीन पसलियों को बलवान बनाता है ।
इ , ई 👉 इसका प्रभाव गले व मस्तिष्क पर होता है । इसलिये गले , नाक और हृदय के ऊपरी भाग की क्रिया विशेष उत्तेजित होती है । इसके उच्चारण से कफ तथा आँतों में जमा मल निकल जाता है और ये भाग स्वस्थ हो जाते हैं ।
उ , ऊ 👉 इसका प्रभाव यकृत , पेट और आँतों पर पड़ता है । इसके नियमित अभ्यास से पेट का भार कम होता है स्त्रियों में पेड़ू रोग में बहुत ही लाभकारी है । गर्भाशय स्वस्थ और सबल बनता है ।
ए , ऐ 👉 इसके निरन्तर अभ्यास से गुर्दे स्पन्दित होते हैं तथा मूत्र सम्बन्धित रोग दूर होते हैं ।
ओ , औ 👉 इसका नियमित अभ्यास आँतों तथा नसों को शुद्ध करता है । जननेन्द्रिय पर भी इसका उत्तम प्रभाव पड़ता है ।
अं👉 बीज मन्त्रों में इसका उपयोग होता है। देर तक घण्टानाद की तरह उच्चारण करते रहने से शरीर के समस्त विकार दूर हो जाते हैं । इसके उच्चारण से छाती व गले को पुष्टता मिलती है तथा हृदय के लिए भी मङ्गलकारी होता है ।
अ:👉 इसके नियमित उच्चारण से मस्तिष्क , कण्ठ तथा हृदय को लाभ पहुंचता है ।
स्वरों के उच्चारण की विधि
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ स्वर के उच्चारण के लिए सुगमावस्था में बैठकर रीढ़ को सीधी रखें । मुख बन्द करके नाक से साँस पूरी व गहरी लें उसके बाद उच्चारण करें । उच्चारण के बाद साँस वहीं 15 (पन्द्रह) सेकेंड या अपनी सामर्थ्य के अनुसार रोक लें । धीरे – धीरे साँस रोकने का अभ्यास बढा दें । यह क्रिया भोजन के पूर्व करना चाहिए । स्वरों के उच्चारण के साथ साँस को निकलते चलें । इस प्रकार इन स्वरों के नियमित अभ्यास से अनेक रोगों का निवारण संभव है । लेख सौजन्य
🚩~*: #धर्मरहस्यज्ञान_समूह
*वि. मनोज अहिरवार*




