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- पतले दस्त लगने पर नागरमोथा, कुडा छाल, खस, लाल चंदन, अतीस, पाठा, धाय के फुल और अनार का छिलका । सभी औषध 25 – 25 ग्राम लेकर मोटा – मोटा कूट कर रख लें। इसमें से 20 ग्राम लेकर, दो कप पानी में डालकर, उबालें। जब पानी आधा कप रह जाएं , तो उतार कर व छानकर ठंडा होने पर सेवन करें ।
- कभी-कभी दस्तों के साथ मरोड़ और दर्द भी होता है । ऐसी स्थिति में , अजमोद, मोचरस, सौंठ और धाय के फुल । समान मात्रा में लेकर, बारीक चूर्ण बना लें। इसे एक छोटा चम्मच मात्रा में , छाछ में घोलकर, दिन में दो – तीन बार या रोग की स्थिति देखते हुए, उतनी बार सेवन करें ।
- बेल का गूदा, सेमल कंद, कत्था और राल, सभी 20 – 20 ग्राम और शक्कर 80 ग्राम । सभी का चूर्ण बना लें। सुबह उठते ही इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा , ठंडे पानी के साथ फाँक लें। यह प्रयोग, आंव, खूनी पेचिश, खूनी बवासीर, रक्त पित्त और दस्त के साथ जलन होना आदि रोग को दूर करने में , अत्यंत प्रभावशाली है ।
- बवासीर के रोगी को, नाग केशर1 ग्राम, मक्खन एक चम्मच और शक्कर दो चम्मच, तीनों को मिलाकर, सुबह – शाम चाट लेना चाहिए ।
- लू लगने पर नेत्रबाला, पदमास, सफेद चंदन और खस । चारों समान मात्रा में , लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को, एक चम्मच, ठंडे पानी के साथ, दिन में दो – तीन बार लेने से, जलन और प्यास पर रोक लगती है और लू के प्रकोप में , कमी होती है । इसी के साथ वीरी के पत्ते और आंवले का चूर्ण, दोनों को पानी में पीसकर, हथेलियों और तालू में , लेप करने से, लाभ होता है ।
- अम्लपित्त के कारण होने वाली जलन और प्यास को रोकने के लिए, हरी नर्म दूब ( दूर्वा घास ) और अनार के छिलके के पानी में , पीसकर और मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है ।
- उल्टी प्रायः पित्त प्रकोप होने से , होती है । उल्टी बंद करने के लिए, कमलगट्टे की मींगी, हरी इलायची, धान की खीलें, लौंग तथा मिश्री , 10 – 10 ग्राम मिलाकर, चूर्ण बना लें। इसे आधा चम्मच मात्रा में , शहद मिलाकर चाट लें। उल्टी बंद हो जाती है ।
- मामुली उल्टी आने पर या जी घबडा़ने पर, सौठ, सतुआ और शक्कर । बराबर भाग लेकर, पीसकर आधा चम्मच फाँकने से, उबकाई आना बंद हो जाती है ।
पथ्य – अपथ्य :—–
पतले दस्त होने पर, दही – चावल का सेवन करें । तले हुए, बेसन के बने , मिर्च – मशालेदार और भारी पदार्थ न सेवन करें । चाय व मीठी वस्तु का सेवन न करें । उल्टी होने पर, पानी कम पीएं। खट्टे – बासी और रूखें पदार्थों का सेवन न करें । बवासीर के रोगी को मिर्च, तैल, गुड़ व बेसन से, बने पदार्थों और गर्म वस्तुओं का सेवन, बिल्कुल बंद कर देना चाहिए । यही पथ्य – अपथ्य का अम्ल पित्त के रोगी को पालन करना चाहिए ।
विशेष :—— आयुर्वेद हमारे संस्कार में है । ऋषि – मुनियों ने, इस चिकित्सा के विकास के लिए, निरंतर मेहनत की है । इस परिश्रम का उद्देश्य लाभ अर्जित करना नही था। स्वस्थ व्यक्ति के अंदर स्वस्थ विचार, धर्म के प्रति आस्था व ईश्वरीय शक्ति पर विश्वास करना। जैसे, उद्देश्यों की पूर्ति होती है ।
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